सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है शरद पूर्णिमा

  • Devendra
  • 29/10/2020
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आस्था: भगवान श्रीहरि लक्ष्मी संग भ्रमण करने आते हैं पृथ्वी पर, भगवान श्रीकृष्ण ने किया था गोपियों संग महारास

गुलाबपुरा। (खारीतट सन्देश) पं. रामगोपाल शर्मा / वर्ष में 12 पूर्णिमा आती है। इनमें शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व शास्त्रों में बताया गया है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा अश्विन (द्वी) शुक्ला पूर्णिमा 30 अक्टूबर को मनाई जाएगी। शरद पूर्णिमा का पुण्यकाल एवं कार्तिक स्नान का आरंभ 31 अक्टूबर को होगा। शरद पूर्णिमा को ‘रास पूर्णिमा’, ‘कोजागरी व्रत पूर्णिमा’ ‘कौमुदी व्रत’ और ‘अश्विन पूर्णिमा’ भी कहते हैं।
शरद पूर्णिमा
भौगोलिक दृष्टि से इस दिन सूर्य तुला राशि के 15 अंश के आस पास आ जाता है। इस दिन शरद ऋतु का अंत हो जाता है। हेमन्त ऋतु का प्रारंभ हो जाता है। यह दिन शरद ऋतु का अंतिम दिन माना गया है। अत: इसे शरद पूर्णिमा के नाम से संबोधित किया गया है।
कोजागरी पूर्णिमा
शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि इस दिन मध्य रात्रि को श्री हरि विष्णु लक्ष्मी के सहित पृथ्वी पर भ्रमण करने आते हैं। अत: इस दिन श्री हरि विष्णु और लक्ष्मी के पूजन का भी विधान है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो गृहस्थी हरि विष्णु तथा लक्ष्मी की पूजा करता है वह वर्ष भर ऐश्वर्य, वैभव और सम्पन्नता से परिपूर्ण होता है। इस दिन के व्रत को कोजागरी व्रत अथवा लक्ष्मीन्द्र व्रत के नाम से भी जानते हैं।
रास पूर्णिमा
शास्त्रों की मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने मध्य रात्रि को गोपियों के साथ पहली बार महारास किया था। यह द्वापर युग के चतुर्थ चरण की बात है। उस महारास को देखने के लिए भगवान श्री हरि विष्णु लक्ष्मी के साथ पृथ्वी पर इस दिन मध्य रात्रि को पधारे थे। उनके सम्मान में चन्द्रमा ने अपनी सोलहवीं कला से अमृत वर्षा की थी। गोपियों ने उनके भोग के लिए क्षीर का भोजन बना कर खुले आसमान के नीचे रखा था। महारास की समाप्ति के बाद श्री हरि विष्णु एवं लक्ष्मी को भोग लगाने के बाद सभी ने क्षीर का प्रसाद ग्रहण किया था। तभी से इस दिन मध्य रात्रि को क्षीर बना कर खुले आकाश में रखने की और तद् उपरांत क्षीर पान करने की परम्परा है।
ऐसे बनी परम्परा
प्रत्येक पूर्णिमा को चन्द्रमा 15 (पन्द्रह) कला से प्रकाशित होता है। केवल अश्विन शुक्ला पूर्णिमा को ही यह सोलह कला से अपना प्रकाश देता है। यह सोलहवी कला अमृत कला के नाम से पृथ्वी पर अमृत प्रसारित करती है। इसलिए अश्विन शुक्ला पूर्णिमा को क्षीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखकर उसे प्रसाद के रूप में पान करने की परंपरा प्रारंभ हुई।
शास्त्रों में पूर्णिमा व्रत का महत्व
हिन्दू संस्कृति के अनुसार इस व्रत को विधि पूर्वक करने से लक्ष्मी देवी प्रसन्न होकर उस गृहस्थी को सुख समृद्धि और धन प्रदान करती हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि रावण इस व्रत को विधि विधान से किया करता था। शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा की अमृतमय चांदनी की किरणों में मेग्निफाईग ग्लास से अपनी नाभि पर केन्द्रित करके रात भर जागृत रहता था। जिससे उसको चिर यौवन प्राप्त हुआ एवं अपार सम्पदा, ऐश्वर्य व वैभव का स्वामी हुआ। नाभि में अमृत का संचय हुआ। व्रत उपवास के साथ आत्मशुद्धि श्रद्धा और विश्वास मुख्य बिन्दु है। यदि आज भी हम कोई व्रत उपवास विधि विधान से श्रद्धा विश्वास और आत्म शुद्धि के साथ करते हैं तो वह निश्चित फलदायी होता है।

अमृत समान है औषधियुक्त खीर-डॉ. नरेन्द्र शर्मा

राजकीय औषधालय के चिकित्सा प्रभारी डॉ. नरेन्द्र शर्मा ने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात खुले आसमान में रखी खीर का सेवन करने से व्यक्ति के शरीर में व्याप्त कई असाध्य रोगों में फायदा पहुंचता है। शरद पूर्णिमा की चांदनी की रोशनी में चांद की किरणें खीर पर पडऩे से वह अमृत समान हो जाती है, और उनका सेवन करने से दमा रोगियों को बेहतर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। शर्मा ने बताया कि चूंकि इस वर्ष कोरोना काल की वजह से विभिन्न देवस्थानों पर बनने वाली औषधियुक्त खीर के कार्यक्रम आयोजित नहीं हो पाएंगे।

इस लिए इस वर्ष उक्त खीर घर पर ही बनाकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। खीर बनाने के लिए दूध, चावल, चीनी और प्रति किलो खीर के हिसाब से 30 ग्राम पीपल की छाल का पाउडर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। पीपल की छाल का पाउडर बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। खीर में आप स्वादनुसार मीठा बढ़ा भी सकते हैं। साथ ही उसमें किसमिस, काजू, बादाम आदि भी डाल सकते हैं। खीर आप अपने घर की रसोई में ही बनाएं और शरद पूर्णिमा की चांदनी निकलने पर घर की छत पर जालीदार वस्तु से ढ़क कर रखे दें। ध्यान रहे कि चांद की किरणें खीर पर अवश्य पड़े। रात एक बजे बाद खीर का सेवन कर लें। साथ ही बेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए खुले आसमान तले चांदनी में टहलें तो अच्छा रहेगा।

प्रमुख शक्तिपीठ बाड़ीमाता धाम पर कोरोना के चलते इस बार नहीं होगा शरद पूर्णिमा महोत्सव
समीपवर्ती प्रमुख शक्तिपीठ श्री बाड़ीमाता धाम पर हर वर्ष शरद पूर्णिमा महोत्सव धूमधाम से मनाया जाता था लेकिन इस वर्ष वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण के चलते यह आयोजन नहीं होगा। मंदिर ट्रस्ट की ट्रस्टी सुश्री कृष्णा टांक ने बताया कि प्रति वर्ष शरद पूर्णिमा पर विशाल भजन संध्या का आयोजन व 21 मण औषधीयुक्त खीर बनाई जाती थी लेकिन महामारी के चलते इस वर्ष सिर्फ माताजी के भोग लगाया जाएगा अन्य आयोजन नहीं होगा।

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