सभी न्यायालयों में हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज हो: पासवान

  • Devendra
  • 14/09/2019
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नई दिल्ली। (वार्ता) लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख राम विलास पासवान ने सरकार से सभी न्यायालयों में हिन्दी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति देने तथा अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने की मांग की है।

श्री पासवान जो केन्द्रीय मंत्री भी हैं, ने आज यहां संवाददाता सम्मेलन में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा देने पर जोर देते हुए कहा कि सरकार को संविधान संशोधन कर उच्चतम न्यायालय और सभी न्यायालयों में हिन्दी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग की अनुमति देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह शर्म की बात है कि आजादी के 72 साल बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग बढते जा रहा है तथा हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की स्थिति दयनीय होती जा रही हैै। अंग्रेजी का स्थान महारानी तथा हिन्दी एवं अन्य भाषाओं का स्थान नौकरानी जैसा हो गया है। उन्होंने कहा कि बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश को छोड़कर अन्य किसी उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी को छोड़कर अन्य किसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता है। सभी विकसित देश अपनी भाषा की बदौलत यह स्थान प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी को जबरदस्ती देश की राजभाषा के रुप में थोपा गया है।

श्री पासवान ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, “ भाषा माता के समान है और माता पर जो प्रेम होना चाहिए वह हमलोगों में नहीं है। हम अंग्रेजी के मोह में फंसे हैं। हमारी प्रजा अज्ञानता में डूबी है। हमें ऐसा उपाय करना चाहिए कि एक वर्ष में राजकीय भाषाओं में, कांग्रेस में, प्रांतीय भाषाओं में तथा अन्य सभा समाज में अंग्रेजी का एक भी शब्द सुनाई न पड़े। हम अंग्रेजी का व्यवहार बिल्कुल त्याग दें।” उन्होंने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था, “ सबसे पहले मैं एक गलतफहमी दूर कर देना चाहता हूं। कितने ही सज्जनों का ख्याल है कि बंगाली लोग या तो हिन्दी के विरुद्ध होते हैं या उसकी उपेक्षा करते हैं। ये बात भ्रम पूर्ण है। इसका खंडन करना मैं अपना कर्त्वय समझता हूं। मैं व्यर्थ अभिमान नहीं करना चाहता परन्तु इतना तो अवश्य कहूंगा कि हिन्दी साहित्य के लिए जितना कार्य बंगालियों ने किया है, उतना हिन्दी भाषी प्रांत छोड़कर और किसी प्रांत के निवासियों ने शायद ही किया हो।

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